दुनिया का सबसे पहला हवाई जहाज 'मरूतसखा' जो कि भारत में बना था

दुनिया का सबसे पहला हवाई जहाज 'मरूतसखा' जो कि भारत में बना था :


सही पढ़ा आपने दुनिया सबसे पहला हवाई जहाज भारत में ही बना था यह कोई इतिहास से छेड़छाड़ नहीं कर रहे है, बल्कि वो सच बता रहे है हमसे और आपसे छुपाया गया है। एक ऐसा सच जिसे हमसे 125 सालो से छुपाया गया है कभी अंग्रेजो के द्वारा तो कभी हमारे ही देश के वामपंथी इतिहासकारों के द्वारा इसलिए की कहीं देश की प्राचीन सभ्यता संस्कृति, हिन्दू धर्म की महानता और सनातन धर्म वैज्ञानिक धर्म है ये पता ना चल जाए।
दुनियां का सबसे पहला विमान मरुतसखा


दुनिया का सबसे पहला हवाई जहाज 'मरूतसखा' सन् 1895 ईसवी को भारत में बना था। जिसको शिवकर बापूजी तलपडे ने भारत के वैदिक ग्रंथ ऋग्वेद और वैमानिक संहिता को पढ़कर बनाया था और उसे समुन्द्र के किनारे स्थित जुहू चौपाटी पर 1500 फ़ीट ऊपर उड़ाया था।इस घटना के आठ वर्ष बाद 17 दिसंबर 1905 को राइट ब्रदर्स ने अपने विमान को 115 फ़ीट तक उचाई पर उड़ाकर इसका पेटेंट अपने नाम के लिया।

शिवकर बापूजी तलपडे का विमान परीक्षण :


भारत में विमान के ऊपर एक पूरा शास्त्र लिखा हुआ है इसका नाम है वह वैमानिक शास्त्र (vaimanika shastra) आमतौर पर लोग इसे वैमानिक संहिता भी कहते हैं इसे रामायण/ महाभारत काल के महर्षि भारद्वाज ने लिखा था। इस किताब की सबसे पुरानी प्रति जो आज हमारे पास मौजूद है वह डेढ़ हजार साल पुरानी है। 

मुंबई के एक बहुत ही प्रसिद्ध ज्ञानी थे जिनका नाम था पंडित सुब्रमण्यम शास्त्री उन्होंने महर्षि भारद्वाज द्वारा रचित वैमानिक शास्त्र और ऋग्वेद का गहन अध्ययन किया जिसके बाद उन्होंने विमान बनाने का कार्य शुरू किया। उन्होंने अपनी एक हस्तलखित पुस्तक भी बनाई हुई थी जिसमें कई प्रकार के विमानों के मॉडल में थे।
जिसे उन्होंने ऋग्वेद और वैमानिक संहिता से पढ़कर बनाया था। 

मुंबई शहर में ही एक शिवकर बापूजी तलपडे नामक व्यक्ति रहा करते थे जो अपने गुरु के सानिध्य में संस्कृत और शास्त्र की शिक्षा लिया करते थे, शास्त्रों के बारे में पढ़ने के बाद उनके मन में भी प्रयोग करने की इच्छा हुई। जहां एक तरफ पंडित सुब्रमण्यम शास्त्री अपना प्रयोग शुरू किए हुए थे कुछ दिनों बाद अस्वस्थ होने के कारण उनकी मृत्यु हो गई इसके बाद शिवकर बापूजी तलपडे ने उनके प्रयोग को आगे बढ़ाया। 

महर्षि भरद्वाज लिखित वैमानिक शास्त्र :


शिवकर बापूजी तलपडे ने महेश भारद्वाज के द्वारा लिखी हुई वैमानिक शास्त्र (vaimanika shastra) में  के विमान बनाने के कुल 500 सिद्धांत दिए हुए थे 3000 श्लोकों के रूप में। 
Vaimanikashastra book written by bharadwaj


इस किताब में कुल 32 तरीके से कुल 500 विमान बनाएं कि प्रक्रिया का वर्णन किया गया था। 

काफी प्रयास के बाद अनेकों तरह के विमान बनाने के बाद शिवकर बापूजी तलपडे ने गैसोलीन के सहयोग से विमान का इंजन बनाया । उन्होंने इस विमान का सफल परीक्षण भी किया चौपाटी पर। 

विमान का सफल परीक्षण देखने आए थे राजा गायकवाड :


उनके इस विमान को देखने के लिए महादेव गोविंद रानाडे और वडोदरा के राजा गायकवाड भी आए थे अपनी पत्नी के साथ। साथ ही आसपास के लोगों को भी काफी भीड़ थी सब ने अपनी आंखों से उस विमान को उड़ते देखा। सबसे खास बात यह है कि यह विमान मानव रहित था, जैसा कि आजकल हम ड्रोन को देख सकते हैं। वही ड्रोन जिसे आज से कुछ ही वर्ष पहले बनाया गया है। 


इस परीक्षण के बाद शिवकर बापूजी तलपडे के पास धन की कमी होने लगी उनके पास इतना धन नहीं था कि वह अपना अगला परीक्षण कर सके। इसी बीच इस विमान के सफल परीक्षण के बारे में अंग्रेजों को पता चली वह नहीं चाहती थी कि कोई भारतीय अपने इस प्रयोग में सफल हो। तलपडे जी से धोखे से ralli brothers ने उनका हस्तलिखित पुस्तक, विमानों की ड्राइंग और कुछ जरूरी डॉक्यूमेंट लेलिये बदले में कुछ धन भी दिया(ऐसा कहा जाता है)। तलपडे जी बहुत सीधे-साधे व्यक्ति थे वो अंग्रेजों के इस धोखेबाजी को समझ ना सके।इस तथ्य का जिक्र करते हुए राजीव दीक्षित जी कहते हैं कि सब कुछ सीखा हमने ना सीखी होशियारी। 


कुछ धन प्राप्त होने के बाद उन्होंने अपने प्रयोग को फिर से आगे बढ़ाया और विमान को बनाने के लिए फिर से लग गए कभी प्रयोगों की बात उन्हें यह बात समझ में आ गई कि विमान को उड़ाने के लिए उन्हें शक्तिशाली ईंधन की आवश्यकता है।

ईंधन के रूप में पारे का किया था इस्तेमाल


गैसोलीन की सबसे बड़ी बात यह थी कि यह कुछ ही भार लेकर के उड़ सकता था, यदि उसमें कोई चालक बैठ जाए तो उसे मान को उड़ाना इतना आसान नहीं था इसके लिए उन्होंने किसी अन्य इंधन की तलाश की। उनकी या तलाश बाद में पारा पर आकर खत्म हुई।

मानव रहित विमान के सफल परीक्षण के कुछ वर्षों बाद पारा द्वारा चलित इंजन बनाने में कामयाब हो गए ।

आपको जानकारी के लिए बता दें कि नासा ने भी कुछ वर्ष पूर्व यही पारे द्वारा चलित इंजन बनाने की ओर पहल की है जिसे आज से 125 वर्ष पूर्व शिवकर बापूजी तलपडे द्वारा बनाया जा चुका है।

 पारे द्वारा चलने वाले इस इंजन की मदद से उन्होंने एक हवाई जहाज बनाया जिसका नाम मरूतसखा रखा।जिस पर बैठकर उन्होंने इस विमान को उड़ाया। इस विमान का भी सफल परीक्षण उन्होंने मुंबई के चौपाटी नामक स्थान पर किया।
Vimana in ancient India vaimanika shastra



इस घटना के लगभग 8 साल बाद 17 दिसंबर सन 1930 को अमेरिका के राइट ब्रदर्स के द्वारा विमान बनाए जाने की बात दुनिया को पता चले अब चाहे हम भारतीयों की मूर्खता कहे या फिर विदेशियों की धोखेबाजी लेकिन यह आविष्कार हमारे नाम दर्ज होने से रह गया। 

प्राचीन वेद पुराण है ज्ञान के भंडार :


हम जानते हैं कि हम भारतीयों की संस्कृति बहुत ज्यादा वैज्ञानिक रही है हमारी वेदों में बहुत सारी बातों का जिक्र किया गया है यदि हम उन्हें महज एक कपोल कल्पना मान कर चलते रहें तो हमारा पतन निश्चित है यदि हम फिर से अपने वेद और शास्त्रों की ओर लौटे तो बहुत कुछ हासिल किया जा सकता है यहां पर हम आधुनिक विज्ञान को छोड़ने की बात नहीं कर रहे हैं अभी तू प्राचीन विज्ञान को आधुनिक विज्ञान के सहयोग से पुनर्जीवित करने की बात कर रहे हैं ।

प्राचीन भारत में उड़ते थे विमान, मिला है सबूत :


भारत में आज से हजारों वर्ष पूर्व के इतिहास में विमानों का जिक्र मिलता है यही नहीं अफगानिस्तान जो कभी भारत का ही हिस्सा हुआ करता था वहां की एक गुफा में महाभारत कालीन एक विमान मिला हुआ है जो कि विमनिका शास्त्र में बताए गए विमान से काफी मिलता-जुलता है इसे यह बात सिद्ध होती है कि भारत में हजारों वर्ष पूर्व विमान उड़ा करते थे और हमारी सभ्यता विश्व की अन्य सभ्यताओं से कहीं ज्यादा विकसित थी बस हमें जरूरत है फिर से वेदों की ओर लौटने की।

निष्कर्ष (conclusion):


हमें उम्मीद है कि आप को पता चल गया होगा कि दुनिया का सबसे पहला विमान भारत में उड़ाया गया था जिसका नाम मरूतसखा (marutsakha) था।  विमान को उड़ाने वाले शिवकर बापूजी तलपडे थे जिन्होंने महर्षि भारद्वाज द्वारा लिखित वैमानिक शास्त्र (vaimanika shastra)  और ऋग्वेद की सहायता से इस विमान का निर्माण किया था। 

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